अमेरिकी टैरिफ का सामना करने को तैयार भारतीय उद्योग : दीपक मैनी

 


-  रणनीति से झटके को अवसर में बदला जा सकता है


- विविधता लाकर निर्यात बाजार को मजबूत करना होगा


गुरुग्राम – अमेरिका द्वारा भारत पर 26 प्रतिशत आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए जाने के फैसले को लेकर प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (PFTI) के चेयरमैन दीपक मैनी ने कहा कि यह भारतीय उद्योगों के लिए एक चुनौती है, लेकिन सही रणनीति से इसे अवसर में बदला जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि निर्यात नीति में बदलाव, वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स पर फोकस और नए बाजारों की तलाश से भारत इस झटके को कम कर सकता है।


अमेरिका भारत का बड़ा निर्यात गंतव्य है। जहां वित्तीय वर्ष 2024 में कुल 6.5 लाख करोड़ रुपये का कुल निर्यात हुआ। इस टैरिफ वृद्धि से भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर असर पड़ सकता है, जिससे निर्यात में कमी आने की संभावना है। दीपक मैनी ने कहा कि भारत का निर्यात पहले ही वैश्विक अनिश्चितताओं, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और लॉजिस्टिक्स समस्याओं से जूझ रहा है। अब इस टैरिफ बढ़ोतरी से कंपनियों को अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ेगा। विशेष रूप से, जिन उत्पादों पर पहले से ही कम मार्जिन था, वे अब और अधिक महंगे हो जाएंगे, जिससे अमेरिकी बाजार में उनकी मांग प्रभावित हो सकती है।


यह सेक्टर होंगे प्रभावित...


- भारतीय स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों पर पहले ही उच्च टैरिफ हैं, और इस वृद्धि से कंपनियों को ज्यादा लागत वहन करनी पड़ेगी।

- भारत से अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात में टेक्सटाइल्स की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत है। टैरिफ वृद्धि से भारतीय कपड़ा उद्योग को कारोबारी प्रतिस्पर्धा में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

- केमिकल्स, स्टील, ऑटो पार्ट्स, मरीन प्रोडक्ट्स मध्यम प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि अमेरिका पहले से ही इन क्षेत्रों में चीन और अन्य देशों से आपूर्ति प्राप्त कर रहा है। 

- फार्मास्युटिकल्स और डायमंड उद्योग पर तत्काल प्रभाव कम रहेगा, लेकिन भविष्य में यदि अतिरिक्त जांच और विनियामक बाधाएं लगाई जाती हैं, तो निर्यातकों को मुश्किल हो सकती है

निर्यात नीति में बदलाव की जरूरत...


पीएफटीआई के चेयरमैन ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी निर्यात नीति को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। जिससे इस प्रकार के टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत को सिर्फ अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अपने व्यापारिक रिश्तों को विविधता प्रदान करनी चाहिए। दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका और अफ्रीकी बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए नई नीतियां बनाई जानी चाहिए।


उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों को वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ना चाहिए, जिससे उनका निर्यात अन्य देशों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी बने। इसके अलावा, सरकार को मेक इन इंडिया और पीएलआई स्कीम के अंतर्गत निर्यातकों को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए, ताकि वे अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों को लॉन्ग-टर्म रणनीति पर काम करना होगा। अमेरिका में मौजूद भारतीय कंपनियों को चाहिए कि वे अपने निवेश और उत्पादन क्षमता को बढ़ाएं, जिससे वे स्थानीय स्तर पर उत्पादन कर सकें और टैरिफ के प्रभाव से बच सकें।


भारत के लिए आपदा कम अवसर ज्यादा...


हालांकि इस टैरिफ वृद्धि से भारतीय निर्यातकों को झटका लग सकता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में भारत को फायदा भी हो सकता है। अल्युमिनियम कॉपर और स्टील पर किसी प्रकार का नया कर नहीं लगा है। दीपक मैनी ने कहा कि ट्रेड डाइवर्जन के चलते अमेरिका कुछ उत्पादों के लिए भारत को चीन का विकल्प मान सकता है। विशेष रूप से, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल्स और टेक्सटाइल्स जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।


ट्रेड वार का भी खतरा...


दीपक मैनी ने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ निर्णय ने दुनिया भर में ट्रेड वार का खतरा बढ़ा दिया है, लेकिन भारत को इससे बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। आने वाले दिनों में यह करेंसी वार का भी अंदेशा है। अगर सरकार और उद्योग जगत मिलकर एक प्रभावी रणनीति तैयार करें, तो यह संकट भारत के लिए नए व्यापारिक अवसर भी ला सकता है।

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